बुधवार, 19 अक्तूबर 2011

प्यार


















प्यार - खुद में रौशनी
प्यार- खुद में पूर्ण 
न इसके पाँव में कांटे चुभते हैं 
न दर्द होता है 
न भय होता है 
न कोई फासले होते हैं .... 
नाग की तरह लहराता साया 
इसे निगल नहीं पाता 
प्यार न किसी की शाबाशी का कायल होता है
न किसी के रहम का इंतज़ार करता है 
प्यार - प्यार ही होता है 
गौर से देखो 
तुम जिसे खुदा या ईश्वर कहते हो
वह प्यार ही होता है ...

शनिवार, 27 अगस्त 2011

मैं थी मैं हूँ मैं ......












दुआओं के धागे बाँध
मैं अदृश्य नहीं थी
मैं हवाओं में थी 
मैं पत्तों के कम्पन में थी 
जहाँ जहाँ मैं नहीं थी
वहाँ वहाँ मैं थी ....

मुझे ढूंढना वक़्त गंवाना है
क्योंकि मैं वक़्त वक़्त में हूँ 
मैं  उसकी आहट हूँ 
कभी मुस्कान 
कभी अजान 
कभी आह्वान .....
तुम क्यूँ हो अनजान 
इतने परेशान
मैं थी मैं हूँ मैं ......

सोमवार, 13 जून 2011

ज़िन्दगी सिर्फ गीत गाती है

















ज़िन्दगी सिर्फ गीत गाती है
रोते शिशु का स्वागत 
मुस्कान से करती है 
कठिनाइयों के बीज तो हम लगाते हैं 
सत्य को अस्वीकार हम करते हैं 
आज कुछ कल कुछ की पेचीदगी में 
कुंठित दीवारें हम खड़ी करते हैं 
फिर आरोप प्रत्यारोप के सिंचन से 
अपने अस्तित्व के आगे प्रश्नचिन्ह लगाते हैं !
जीना है तो ज़िन्दगी के गीत सुनो 
जो शिशु के रुदन के निकट लोरी बन जाती है 
गहरी नींद में हल्की मुस्कान बन जाती है

सोमवार, 30 मई 2011

ऐसा होता है















हमें लगता है हमने बहुत सीख लिया जीवन से 
और अनुभवी से भाव बना लेते हैं 
सच कितना परे होता है इससे 
शिक्षा तो कभी ख़त्म नहीं होती 
नन्हें कदमों की भी एक सोच होती है
उम्र का फर्क होता है
पर प्यादे  भी कई बार 
बादशाह  सलामत के छक्के छुड़ा  जाते हैं !!!

शुक्रवार, 20 मई 2011

बोलो तो



मेरे पास एक गुनगुनाती हवा है
एक गुनगुनाती चिड़िया है
एक खुला आसमान है
उसमें टंगे इन्द्रधनुषी सपने हैं
बादलों की पालकी है 
जीने के लिए काफी है न 
बोलो तो ...

मंगलवार, 17 मई 2011

खुश हैं


आहटें सुनाई देती हैं 
किसकी हैं ये आहटें 
उसकी ........ जिसे मैंने विस्मृत कर दिया ?
डर लगता है इन आहटों के भ्रम से 
बहुत मुश्किल से मैंने जीना सीखा है 
अपनी आत्मा को समेटा है 
खुद को जाना है 
परिंदे भी खुलकर गाते हैं 
हवाएं खिलखिलाती हैं 
हम सब मुक्त हैं , खुश हैं 

रविवार, 15 मई 2011

छोटा सा फर्क



एक पत्ता
सूखा हो या हरा 
ज़िन्दगी की ही बात करता है 
फर्क बस इतना 
कि एक कहता है 
मुझमें ज़िन्दगी है
दूसरा कहता है
मुझमें ज़िन्दगी थी 
कितना छोटा सा फर्क 
पर एक चपल
एक ठहरा हुआ ...